Explained: NATO के टूटते ही यूरोप में होगी जंग? परमाणु कवच बना रहा फ्रांस!

Donald Trump के President बनते ही America वाले NATO में बवाल मचा है. America ने NATO की Commandership से हटने का ऐलान कर दिया है जबकि France और Britain मिलकर Europe में Nuclear Shield बनाने की तैयारी में है. इस मुद्दे पर European Countries में फूट पड़ चुकी है. जिसके बाद France के President Emmanuel Macron ने French Army को तैयारी करना शुरू कर दिया है.

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सांची त्यागी

22 Mar 2025 (अपडेटेड: 22 Mar 2025, 04:57 PM)

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न्यूज़ हाइलाइट्स

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NATO की कमांडरशिप छोड़ने पर विचार कर रहा अमेरिका

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यूरोप पर बढ़ते खतरें के बीच जंग की तैयारी में जुटा फ्रांस

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परमाणु कवज पर फिर से बातचीत शुरू करेंगे फ्रांस और ब्रिटेन

फ्रांस के हर घर तक फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों कुछ पर्चे बंटवा रहे है. इन पर्चों में युद्ध की स्थिति में लोगों को क्या करना है? कैसे रहना? कहां रहना? कैसे खाने-पीने की व्यवस्था करनी है? ऐसी तमाम जानकारी इन पर्चों में दी गई है. ऐसे सवाल उठ रहे है कि क्या मैक्रों डर रहे है? क्या युद्ध की तलवार यूरोप की तरफ घूम चुकी है? क्या रूस-अमेरिका के करीब आने से फ्रांस को खतरा है? अगर हां तो क्या फ्रांस की सेना रूस या अमेरिका को जवाब देने के लिए तैयार है?

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नाटो के टूटने या बिखरने की खबरों के बीच फ्रांस की तैयारियां इस तनाव को और पक्का कर रही है. पिछले महीने प्रधानमंत्री मोदी के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से मुलाकात की थी. मुलाकात तब तक ठीक थी जबतक यूक्रेन को दी जाने वाली मदद का जिक्र नहीं आया था. और जैसे ही ट्रंप ने यूरोप के खिलाफ बोलना शुरू किया वैसे से मैक्रों ने बीच में रोककर ट्रंप को ठीक करने की कोशिश की.

 

अमेरिका-फ्रांस के बीच बढ़ा तनाव

ट्रंप-मैक्रों के बीच की बहस तनाव की बस शुरूआत थी. अब तक यूरोपीय देशों पर बयान से वार करने वाले ट्रंप अब एक्शन लेना शुरू कर रहे थे. फिर मौका आया यूक्रेन युद्ध को खत्म करने की कोशिश की जिसमें ट्रंप ने सीधे पुतिन को फोन घुमा दिया. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका-रूस के एक साथ आने का पहला मौका तब आया जब सऊदी अरब में युद्ध को खत्म करने को लेकर बैठक हुई. इस बैठक में रूस था अमेरिका था सऊदी अरब की धरती थी पर यूरोप कहीं नहीं था. शुरूआत से अब तक ये लड़ाई पश्चिमी देशों और रूस की थी लेकिन ट्रंप के आते ही पश्चिमी देश बिखर गए और हद तो तब हो गई जबा नाटो के खिलाफ ट्रंप की बयानबाजी तेज हुई. मामला यूरोप पर टैरिफ लगाने से आगे बढ़कर नाटो की कमांडरशिप त्यागने और नाटो के नाम पर युद्ध में फिजूल खर्चे तक पहुंच गई.

 

ट्रंप का कहना था कि किसी देश के युद्ध का खर्च अमेरिका क्यों उटाएं. उनका ये रुख नाटो के मूल सिंद्धात के खिलाफ था जिसमें नाटो सदस्य देश पर हमले कि स्थिति में नाटो का एक साथ आकर जंग में कूदना शामिल था. अब यहीं से टकराव बढ़ता जा रहा है. और फ्रांस अपनी तैयारियों में जुटा है. फ्रांस ने कुछ बड़े प्रस्तावों में काम करना शुरू कर दिया. इसमें पहला यूक्रेन को युद्ध में सैन्य सहायता जारी रखना था, फिर टैरिफ का मुकाबला करने के लिए अमेरिकी सामान का बहिष्कार करना, मैक्रों ने यूरोप के लिए परमाणु शील्ड पर भी बातचीत फिर शुरू कर दी.

 

एक दूसरे के करीब आए फ्रांस-अमेरिका

फ्रांस ने ऐसे वक्त पर बड़े फैसले किए है जब रूस-अमेरिका के दूसरे के थोड़ा करीब आ गए. अब यहां समझना जरूरी है कि अगर अमेरिका और रूस एक साथ आते हैंचाहे वह सैन्य, कूटनीतिक, या रणनीतिक समझौते के रूप में ही क्यों न होतो यूरोप के लिए कई जोखिम उभर सकते हैं. कैसे?

पहला, यूरोप की सुरक्षा काफी हद तक नाटो पर निर्भर है, जिसमें अमेरिका की भूमिका सबसे बड़ी है. अगर अमेरिका रूस के साथ किसी सौदे में अपनी प्रतिबद्धता कम करता है, तो नाटो कमजोर पड़ सकता है. इससे रूस को यूक्रेन जैसे क्षेत्रों में अपनी आक्रामकता बढ़ाने का मौका मिल सकता है, जो पूर्वी यूरोप के लिए सीधा खतरा होगा.

 

फ्रांस की सेना कर पाएगी अमेरिका-रूस का मुकाबला?

इससे निपटने के लिए यूरोप की सैन्य क्षमता मजबूत होनी चाहिए. और इस मामले में सबसे मजबूत फ्रांस ही है. चलिए अब बात फ्रांस की सैन्य क्षमता की करते है. फ्रांस की सेना, यूरोप की सबसे शक्तिशाली और पेशेवर सैन्य शक्तियों में से एक है. फ्रांस का इतिहास युद्ध से भरा. ऐसे युद्ध जिसे फ्रांस अपनी ताकत अपनी क्षमता के दम पर जीता है. अपने समय में फ्रांस दुनिया में सबसे शक्तिशाली देश तक रहा. जिसने हर युग में अपने आपको मजबूत बहुत मजबूत किया. हांलाकि आज भी ऐसा कहना मुश्किल है. चलिए फ्रांस की सैन्य ताकत का आकलन इसके सैनिकों की संख्या, उपकरण, परमाणु क्षमता, और वैश्विक तैनाती के आधार पर करते है.

  • अभी फ्रांसीसी सेना में सक्रिय सैनिकों की संख्या लगभग 203,000 है,

  • जिसमें 121,000 थल सेना, 36,000 नौसेना, और 41,000 वायु सेना में शामिल हैं

  • इसके अलावा, 60,000 से अधिक रिजर्व सैनिक है.

  •  जेंडरमेरी, जो आंतरिक सुरक्षा और सैन्य पुलिस का काम देखती है, उसमें करीब 100,000 जवान हैं

अब बात फ्रांस की परमाणु क्षमता की करते है. फ्रांस की सैन्य शक्ति का सबसे बड़ा आधार इसका परमाणु ढाल है. फ्रांस दुनिया का चौथा सबसे बड़ा परमाणु शक्ति वाला देश हैं. फ्रांस के पास 290 परमाणु हथियार है. फ्रांस के पास चार Triomphant-श्रेणी की पनडुब्बियाँ M51 बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस हैं, जो 8,000 किलोमीटर तक मार कर सकती हैं. इसके अलावा, फ्रांस के Rafale लड़ाकू विमान ASMP-A परमाणु क्रूज मिसाइलों से लैस है जो छोटी लेकिन प्रभावी ताकत से बड़े दुश्मन को रोक सकती है

 

इसके अलावा फ्रांस के पास एक से बढ़कर एक हथियार मौजूद है. फ्रांस के पास टैंक, बख्तरबंद गाड़ी, परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत, परमाणु पनडुब्बियां और फाइटर जेट्स की बेशुमार सिरीज है. जो इसे यूरोप का सबसे मजबूत सैन्य शक्ति बनाता है. फ्रांस की सेना मजबूत है जरूर है, लेकिन रूस या अमेरिका की तुलना में इसकी संख्या और संसाधन सीमित हैं. रूस ने फ्रांस पर हमला किया और अमेरिका या बाकी देशों से सहयोग नहीं मिला तो अकेले अपने दम पर अकेले टिकने में फ्रांस को मुश्किल होगी.

 

हांलाकि ये इतना आसान भी नहीं है. जितना आसान बोलना या कल्पना करना है. क्योंकि फ्रांस तक पहुंचने से पहले रूस को जर्मनी, पोलैंड और बाकी यूरोपीय देशों का सामना भी करना पड़ेगा. इसी से निपटने के लिए भी मैक्रों न्यूक्लियर शील्ड की बात कर रहे है. इससे पहले भी मैक्रों इस प्रस्ताव का जिक्र कर चुके है. इसके मुताबिक पूरा यूरोप अपने परमाणु हथियारों को साझा करेगा. हांलाकि खतरा सिर्फ जंग का नहीं है.. खतरा को उस एकता, उस गठजोड़ के टूटने को लेकर है जो पूरे पश्चिमी दुनिया को जोड़कर रखे हुए था.

 

फ्रांस समेत पूरे यूरोप को डर है कि अमेरिका-रूस का गठजोड़ यूरोप में राजनीतिक एकता को तोड़ सकता है. खासकर तब जब अमेरिका नाटो से पीछे हटेगा और रूस के साथ ऊर्जा या व्यापार जैसे मुद्दों पर सहयोग करेगा तब. ऐसी स्थिति यूरोपीय देश विभाजन की तरफ बढ़ सकता है. जिसका खतरा फ्रांस को सता रहा है. और फ्रांस तैयारियों में जुटा हुआ है.

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