वक्फ बिल पर NDA में दरार? सहयोगी दलों की असहमति से बढ़ी मुश्किलें!

मोदी सरकार वक्फ बिल को मौजूदा सत्र में पारित कराने की तैयारी में है, लेकिन राज्यसभा में समर्थन जुटाना चुनौती बन सकता है. टीडीपी, जेडीयू और लोजपा के रुख से सरकार की रणनीति प्रभावित हो सकती है.

NewsTak

विजय विद्रोही

• 12:16 PM • 30 Mar 2025

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मोदी सरकार के लिए वक्फ बिल एक नई चुनौती बनकर सामने आया है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि मौजूदा बजट सत्र में ही इस बिल को संसद के दोनों सदनों में पेश कर इसे पारित कराने की योजना बनाई गई है. लेकिन, यह उतना आसान नहीं दिख रहा है.

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राजनीतिक समीकरणों में उलझी सरकार

चार अप्रैल तक संसद का सत्र चलने वाला है, और एक अप्रैल को ईद की छुट्टी होने के कारण सरकार के पास प्रभावी रूप से मात्र तीन कार्यदिवस बचते हैं. हालांकि, भाजपा को लोकसभा में बहुमत प्राप्त है, लेकिन राज्यसभा में उसे अन्य दलों के समर्थन की आवश्यकता होगी.

तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के नेता चंद्रबाबू नायडू, जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के प्रमुख नीतीश कुमार और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के चिराग पासवान जैसे सहयोगी दल इस मुद्दे पर सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. टीडीपी के 16 सांसद, और जेडीयू व लोजपा के सांसदों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. नायडू पहले ही साफ कर चुके हैं कि वे अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं, और वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा उनके लिए अहम मुद्दा है.

जेपीसी में संशोधनों पर विवाद

जब यह बिल पहले संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजा गया था, तब विपक्षी दलों ने इस पर कई संशोधन सुझाए थे, लेकिन इनमें से किसी को भी स्वीकार नहीं किया गया. विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार ने उनकी आपत्तियों को अनदेखा किया और अपनी मनमर्जी से रिपोर्ट तैयार की.

इस बिल को लेकर मुस्लिम संगठनों में भी नाराजगी देखी जा रही है. वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों का अंतिम निर्णय सरकारी अधिकारियों द्वारा लिया जाएगा और इसमें गैर-मुस्लिम सदस्य भी शामिल किए जाएंगे.

नीतीश कुमार और चिराग पासवान का असमंजस

जेडीयू के नेता नीतीश कुमार ने संकेत दिया है कि बिहार विधानसभा चुनाव से पहले इस बिल को पेश करना उचित नहीं होगा. वहीं, चिराग पासवान ने कहा है कि उनकी पार्टी भाजपा की विचारधारा से अलग सोच रखती है और वे आधुनिक राजनीति के अनुसार निर्णय लेंगे.

मोदी सरकार के लिए कठिन दौर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मोदी सरकार इस बिल को जल्दबाजी में पारित कराने का प्रयास करती है, तो उसके सहयोगी दल असहज हो सकते हैं और गठबंधन में दरारें आ सकती हैं. वहीं, यदि सरकार इस बिल को टालती है, तो यह उसकी रणनीतिक हार मानी जा सकती है.

अब देखना यह होगा कि सरकार इस संकट से कैसे निपटती है.क्या वह अपने सहयोगियों को मनाने में सफल होती है, या फिर किसी रणनीतिक कारण से इसे आगे टालने का निर्णय लेती है.

यहां देखें वीडियो:

 

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