Waqf Bill Decoded By Vijay Vidrohi: लंबे इंतजार के बाद आखिरकार मोदी सरकार वक्फ संशोधन विधेयक 2025 को संसद में पेश करने के लिए तैयार है. यह बिल चर्चा में है, लेकिन इसके पीछे की मंशा और प्रभाव को लेकर सवालों का दौर शुरू हो गया है. आखिर इस बिल में ऐसा क्या है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी ही सरकार को जोखिम में डालने को तैयार हैं? क्या यह बिल बीजेपी के हिंदू एजेंडे का हिस्सा है या फिर सहयोगी दलों की परीक्षा लेने की रणनीति? आइए, वरिष्ठ पत्रकार विजय विद्रोही के नजरिए से समझते हैं.
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वक्फ बिल का मकसद क्या है?
वक्फ संशोधन विधेयक का उद्देश्य वक्फ बोर्ड की संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता लाना बताया जा रहा है. सरकार का कहना है कि इससे अल्पसंख्यक समुदाय के जरूरतमंद लोगों को फायदा होगा. लेकिन विपक्ष और कुछ जानकार इसे बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति का हिस्सा मान रहे हैं. सवाल यह है कि क्या यह बिल सिर्फ जनता के बीच संदेश देने के लिए लाया जा रहा है या इसके पीछे कोई बड़ी रणनीति छिपी है?
सहयोगी दलों पर नजर
एनडीए गठबंधन में शामिल नीतीश कुमार (जेडीयू), चंद्रबाबू नायडू (टीडीपी), चिराग पासवान (एलजेपी) और जयंत चौधरी (आरएलडी) के पास कुल 35 लोकसभा सांसद हैं. इन नेताओं का समर्थन बीजेपी के लिए जरूरी है. लेकिन वक्फ बिल जैसे संवेदनशील मुद्दे पर इनका रुख क्या होगा? क्या बीजेपी ने इनके साथ पर्दे के पीछे कोई सहमति बना ली है? या फिर यह बिल इनके धैर्य की परीक्षा लेने का जरिया है? बिहार में नीतीश कुमार का मुस्लिम वोट बैंक अहम है, ऐसे में क्या बीजेपी उनकी नाराजगी मोल लेने को तैयार है?
बिल पेश करने का समय क्यों?
फिलहाल देश में कोई बड़ा चुनाव नजदीक नहीं है. हां, बिहार में विधानसभा चुनाव जरूर होने हैं, जहां बीजेपी को नीतीश का साथ चाहिए. कुछ लोग कह रहे हैं कि बीजेपी इस बिल को अभी पेश करके अपने हिंदू वोटरों को यह दिखाना चाहती है कि वह अपने एजेंडे पर कायम है. साथ ही, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को खुश करने और उसकी नाराजगी दूर करने की कोशिश भी हो सकती है. लेकिन अगर नीतीश या नायडू नाराज होते हैं, तो बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है.
संसद में क्या होगा?
सूत्रों के मुताबिक, आज दोपहर 12 बजे लोकसभा में यह बिल पेश हो सकता है. लेकिन विपक्ष इसका विरोध कर सकता है. अगर यह बिल हाउस ऑर्डर में शामिल नहीं हुआ, तो क्या स्पीकर सत्र स्थगित कर देंगे? या शोर-शराबे के बीच इसे पेश करने की इजाजत मिलेगी?
मान लीजिए बिल पेश हो जाता है, तो क्या 2 अप्रैल को ही बहस होगी? विपक्ष कह सकता है कि बिल विवादित है और इसे पढ़ने-समझने के लिए कम से कम एक दिन का वक्त चाहिए. ऐसे में क्या स्पीकर 3 अप्रैल को बहस तय करेंगे? और अगर बहस होती है, तो क्या 4 अप्रैल (सत्र का आखिरी दिन) तक बिल पास हो पाएगा? अभी तक सत्र बढ़ाने की कोई खबर नहीं है.
बीजेपी की रणनीति क्या है?
कई लोगों का मानना है कि बीजेपी इस बिल से कई निशाने साधना चाहती है. पहला, हिंदू वोटरों को संदेश देना कि वह अपने वादों पर अडिग है. दूसरा, संघ को यह दिखाना कि सरकार जोखिम उठाने को तैयार है. तीसरा, सहयोगी दलों को यह कहने का मौका देना कि “बिल तो बस पेश हुआ है, पास नहीं हुआ.” इससे बीजेपी को फेस सेविंग मिलेगी और सहयोगी भी अपने वोट बैंक को संभाल सकेंगे. लेकिन कुछ जानकार कहते हैं कि बीजेपी इसे अभी पास नहीं कराएगी. शायद अगले साल पश्चिम बंगाल, असम और केरल के चुनावों से पहले यह बिल दोबारा लाया जाए, ताकि हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण का फायदा मिल सके.
क्या कहते हैं आलोचक?
विपक्ष का कहना है कि बीजेपी बिल पेश करके भाग रही है और बहस से डर रही है. वे नीतीश और नायडू से अपना रुख साफ करने की मांग कर रहे हैं. अगर बिल पास नहीं हुआ, तो विपक्ष इसे सरकार की नाकामी बताएगा. दूसरी ओर, बीजेपी के लिए यह बिल बिहार में नीतीश को खोने का जोखिम भी बन सकता है, जहां मुस्लिम वोट अहम हैं.
आगे क्या होगा?
क्या यह बिल अभी सिर्फ पेश होगा और मानसून सत्र तक टल जाएगा? या बीजेपी बिहार चुनाव के बाद इसे पास कराने की कोशिश करेगी? यह देखना दिलचस्प होगा कि मोदी सरकार इस जोखिम को कैसे संभालती है.
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